(दीपक आनंद) केंद्र सरकार वन नेशन वन हेल्थ सिस्टम पॉलिसी 2030 तक लॉन्च कर देगी। इसमें शिक्षा और रिसर्च में एलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेद को एक दूसरे से जोड़ा जाएगा। पॉलिसी का मकसद इंटीग्रेटिव हेल्थ सिस्टम तैयार करना है। यह पॉलिसी एनईपी में भी शामिल है।
एनईपी के मुताबिक हमारा हेल्थकेयर एजुकेशन सिस्टम इंटीग्रेटिव होना चाहिए। यानी एमबीबीएस छात्रों को आयुष की बेसिक समझ होनी चाहिए इसी तरह आयुष छात्रों को भी एलोपैथी की नॉलेज होनी चाहिए। सरकारी स्तर पर भले ही आयुष को प्रमोट करने की बात चल रही है लेकिन हकीकत यह है कि एजुकेशन सिस्टम में पढ़ाई के लिए एमबीबीएस ही नंबर एक पर है। बीडीएस, फिजियोथैरेपी भी सेकेंड चॉइस के रूप में चुने जाते हैं। ऐसे में आयुष कोर्सेस को प्राथमिकता मिलने का सवाल ही नहीं है।
पीछे की रैंक्स पर मिलता है प्रवेश, कट ऑफ में भी अंतर
हर साल ऑल इंडिया कोटे की जनरल कैटेगरी में 13-14 हजार की रैंक पर सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलता है। 2019 की आयुष काउंसलिंग के मॉप अप राउंड के आंकड़ों के अनुसार राष्ट्रीय संस्थानों में आयुष की ओपनिंग रैंक 14,300 रही। नीट में आखिरी रैंक 8 लाख तक रही। इस रैंक पर आयुष कॉलेज मिल गया। एमबीबीएस व आयुष की कट ऑफ में भी काफी अंतर रहता है। 550 अंकों पर जहां एमबीबीएस के लिए सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिलता है। वहीं 400 अंक हासिल करने पर आयुष कॉलेज मिल जाता है।
बीएएमएस में भी एलाेपैथी
2014 में आयुर्वेद, योगा, यूनानी, सिद्धा व होम्योपैथी को आयुष के रूप में मर्ज किया गया। इन सभी में आयुर्वेद अधिक चुना जाता है। 2017 में एम्स की तर्ज पर ऑल इंडिया आयुर्वेद इंस्टीट्यूट शुरू हुआ। देश में 240 आयुर्वेदिक कॉलेज हैं। सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन आयुर्वेद शिक्षा से जुड़े मामलों की मॉनिटरिंग करती है।
पिछले सालों में इसने कई नॉर्म्स व रेग्युलेशन जारी किए हैं लेकिन शिक्षा के हालात चिंंताजनक हैं। एमबीबीएस कॅरिकुलम की शुरुआत से लेकर अब तक उसमें ट्रेडिशनल मेडिसिन के कोर्सेस शामिल नहीं हैं जबकि आयुर्वेद डॉक्टर्स मॉर्डन एनाटमी व फिजियोलॉजी पढ़ते हैं।
पीछे है आयुष फिर भी फायदेमंद
आयुष की सबसे बड़ी कमी इसमें सर्जरी व डाइग्नोसिस का शामिल न होना है। सरकारी नौकरियों में ग्रेड पे सभी का लगभग समान है। लेकिन प्राइवेट प्रैक्टिस चुनौतीपूर्ण है। दूसरी ओर डब्ल्यूएचओ के अनुसार 1,000 की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए। देश में 1343 की जनसंख्या पर एक एलोपैथिक डॉक्टर उपलब्ध है। एलोपैथी के साथ आयुष को जोड़ने से 825 की आबादी पर एक डॉक्टर मिलता है।
एक्सपर्ट पैनल
गुजरात जामनगर के आयुर्वेद संस्थान को हाल में राष्ट्रीय संस्थान का दर्जा दिया गया है। इसके साथ ही संसद में आयुष को लेकर दो नए बिल भी पास किए गए हैं। इससे इस कोर्स की गुणवत्ता बेहतर होगी।
-राजेश कोटेचा, सचिव, आयुष मंत्रालय, नई दिल्ली
दक्षिण के राज्यों में आयुर्वेद व होम्योपैथी स्टडीज का अधिक चलन है। राजस्थान में स्टूडेंट्स की डिग्री पूरी होने के बाद भी सरकारी अस्पतालों में उनकी नौकरी नहीं लगती है। इस कारण छात्र आयुष में रुचि नहीं लेते।
-डॉ. सुभाष शर्मा, डायरेक्टर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद, जयपुर
आयुष को लेकर अवेयरनेस नहीं है। एलोपैथी की तुलना में आयुष कॉलेजों की फंडिंग काफी कम है। पॉलिसी स्तर पर भी बदलाव की जरूरत है।
-डाॅ. अनु भटनागर, रिसर्च ऑफिसर, सीसीआरएएस, नई दिल्ली
कोरोना में फोकस इम्यूनिटी बढ़ाने पर है। ऐसे में आयुर्वेद का अच्छा स्कोप नजर आ रहा है। पीजी के बाद यहां भी अच्छे अवसर हैं।
-डॉ. अमित कुमार शर्मा, एमडी, आयुर्वेद, पीएचडी
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https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/jaipur/news/an-entrance-a-syllabus-grade-pay-is-the-same-yet-mbbs-first-and-ayush-last-choice-127760224.html